बरसात में दलदल में तब्दील हो जाती है कच्ची पगडंडी, स्कूली बच्चों और ग्रामीणों की दुश्वारियां बढ़ीं
सोनभद्र (बभनी): आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर चैनपुर गांव के ग्रामीण आज भी पक्की सड़क का सपना देख रहे हैं। बभनी विकासखंड अंतर्गत ब्राह्मण बस्ती के लोग पिछले 65 वर्षों से सड़क की बदहाली का दंश झेल रहे हैं। शासन-प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की घोर उपेक्षा के कारण विस्थापित परिवारों का जीवन नारकीय बना हुआ है।
1960 से जारी है संघर्ष
जानकारी के अनुसार, रिहंद जलाशय के निर्माण के बाद विस्थापित हुए ये दर्जनों परिवार जहां सैकड़ों की आबादी है वर्ष 1960 में चैनपुर आकर बसे थे। उम्मीद थी कि नई जगह पर उन्हें बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन छह दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी यहां पक्की सड़क नहीं बन सकी है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि प्रशासन ने पुनर्वास तो कर दिया, लेकिन विकास की नींव डालना भूल गया।

बरसात में मुसीबत का सबब बनी पगडंडी
सड़क की स्थिति इतनी दयनीय है कि बरसात के दिनों में यह कच्ची पगडंडी पूरी तरह दलदल में बदल जाती है। ग्रामीण बताते हैं कि कीचड़ और फिसलन के कारण घर से बाहर निकलना भी दूभर हो जाता है। सबसे बुरा हाल स्कूली बच्चों का है, जिन्हें घुटने भर कीचड़ और जलभराव के बीच से गुजरकर शिक्षा पाने के लिए स्कूल जाना पड़ता है।उनकी किताबें-कपड़े खराब हो जाते हैं, जिससे उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ सकती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन के अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन हर बार उन्हें केवल कोरे आश्वासन ही मिले। पक्की सड़क के अभाव में आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस भी गांव तक नहीं पहुंच पाती, जिससे मरीजों को बड़ी मुश्किल से मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है।
ग्रामीणों ने की तत्काल कार्रवाई की मांग
बभनी के चैनपुर ब्राह्मण बस्ती के निवासियों ने जिलाधिकारी और शासन से मांग की है कि इस बार उनकी समस्या को प्राथमिकता के आधार पर संज्ञान में लिया जाए। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई, तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
“हम 65 साल से सड़क की राह देख रहे हैं। क्या हम केवल वोट बैंक हैं? सरकार हमें विस्थापितों का दर्जा तो देती है, लेकिन बुनियादी सुविधाएं देने में हर बार अनदेखी की जाती है।” — ग्रामीणों का आक्रोश

